
दोस्त मेरा...
कभी फूल तो कभी गुल्नारों की बातें करता था
दोस्त मेरा चाँद सितारों की बातें करता था
दूर तलक कड़ी धूप में चलते चलते
दोस्त मेरा बहारों की बातें करता था
डूब गया गैरों को पार लगाने में
दोस्त मेरा किनारों की बातें करता था
ख़ुद अपनी हथेली पर पैर रखकर चला
दोस्त मेरा बेसहारों की बातें करता था
लहू भी जम गया है कहीं शिराओं में
दोस्त मेरा अपने प्यारों की बात करता था
दाग
तुम्हारे आँचल में टांकते हुए
चाँद सितारे मैंने जख्मी कर ली है
अपनी आत्मा तक
इससे टपका लहू का एक कतरा
अनचाहे ही तुम्हारे आँचल में
पा गया है पनाह
और हो गया है सुर्खरू
इस बात से बेखबर
तुम्हारी निगाहों में होगा ये एक
दाग
Bahut Khoob...
ReplyDeleteडूब गया गैरों को पार लगाने में
ReplyDeleteदोस्त मेरा किनारों की बातें करता था
ख़ुद अपनी हथेली पर पैर रखकर चला
दोस्त मेरा बेसहारों की बातें करता था
लाजबाब !
डूब गया गैरों को पार लगाने में
ReplyDeleteदोस्त मेरा किनारों की बातें करता था
बहुत ही बेहतरीन अभिव्यक्ति ।
बहुत सुंदर है दोनों !!
ReplyDeleteबहुत ही बेहतरीन अभिव्यक्ति ......
ReplyDeletebahut sunder dono bhi.
ReplyDeleteदोनों रचनायें अच्छी लगीं
ReplyDeleteजिस तरह आपने एक तरफ दोस्त के बारे में बताते हुए एक अच्छे इंसान की और साथ ही समाज की बात कही वहीं आपने दूसरी रचना में चाहने वाले की आत्मा और मन दोनों को दिखा दिया है.
ReplyDeleteआपकी रचना गर्मी में ठंडी हवा के झौंके के समान होती है. पढ़कर मान प्रसन्न हो जाता है.
मान को मन पढ़ें
ReplyDeletedono kavitaen bahut hi sundar hain.....
ReplyDeletewah wah wah...
ReplyDeletebahut he badhiya rachna hai ji aapki...
cheers!
http://shayarichawla.blogspot.com/
behtareen
ReplyDeletekhoobsoorat abhivyakti hai ji...
ReplyDeletedost mera me to tumne bahut gahri baat kahi kash mera hi koi aisa dost hota
ReplyDeletedag bhi bahut acchi poem hai
ReplyDeleteलहू टपके तो असर तो होगा ही... क्या फर्क पड़ता है अगर कोई किसी की नज़र में दाग हो.... आसूदगी(संतुष्टि) मयस्सर तो है.... संवेदनाओं की बेहतरीन अभिव्यक्ति देखने को मिली है "दाग़" में....।
ReplyDeleteऔर ग़ज़ल के सिलसिले में- डूबते को किनारे लगानेवाले किस्मत के भरोसे नहीं खुद के दम पर पार लगाते हैं.... लिहाज़ा डूब भी जाएं तो सबक तो बन ही जाते हैं... गज़ल में खुद अपनी हथेली पर पांव रखकर चलने का हासिल दर्द ही है....ग़ज़ल दर्द का एहसास तो कराती ही है.... जिंदगी की उन सच्चाईयों की एक झलक भी दिखाती है जिनके सहारे दुनिया में याद रखे जाने की वजहें तैयार होती हैं। ( पुनरावृत्ति की कुछ कमियों के बावजूद बेहतरीन प्रस्तुति..)
आजकल ऐसे ही दोस्त मिलते हैं, जो दाग़ दे जाते हैं.. दुश्मनों की ज़रूरत क्या है फिर हमें..
ReplyDeleteबेहतरीन प्रस्तुति....हमेशा आपके नए पोस्ट का इंतजार रहता है।
ReplyDeleteलहू भी जम गया है कहीं शिराओं में
ReplyDeleteदोस्त मेरा अपने प्यारों की बात करता था !
really very nice...
ये दाग नही चाँद है .... बिंदिया है माथे पर ... नसीब वालों को ही नसीब होती है ..... सुंदर रचनाएँ .....
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