
दुनिया में न जाने कितनी ही हस्तियों ने आंखे ने खोली, अपना-अपना हुनर आजाया कुछ लोग तो बड़ी शान से उभरे उनका फन मशहूर हुआ मगर ये फन देर तक नहीं रह सका। उन्हें वह बुलंदियां नहीं नसीब हो सकी जिनके वो हकदार थे। जबकि कुछ लोग ऐसे भी पैदा हुए जिन्होंने जब अपने महबूब फ़न को लोगों के सामने पेश किया तो लोगों हाथों हाथ कुबूल किया उन्हें वह शोहरत और बुलंदी नसीब हुई जिसका उन्हें अंदाजा भी नहीं था। हिंदुस्तान की फिल्मी दुनियां में भी हजारों ऐसे चहरे ने जन्म लिया जो कुछ वक्त तक अपने हुनर से लोगों को दीवाना बनाते रहे मगर ऐसा वक्त भी आया जब वह उनका उंदाजो अदा लोगों को अपना गरवेदह न बना सका। फिल्मी दुनिया में कुछ ऐसे नाम हैं जो आज तक अपने हुनर की बदौलत दुनिया से जाने के बाद भी अपने चाहने वालों के ख्वाबों खयालों में जिंदा और ताबिंदा हैं। भारतीय फिल्मी दुनिया में बहुत सारे गीतकारों ने अपनी कलम का जादू बिखेरा और कुछ मुद्दत तक लोगों के दिलों पर राज भी किया लेकिन उनकी एक बार की खामोशी के बाद दोबारा लोगों ने उनकी तरफ मुड़कर नहीं देखा।
फिल्मी दुनिया के बेहतरीन गीतकारों का जिक्र हो और साहिर लुधियानवी की बात न हो ऐसा मुमकिन ही नहीं। गीतकारों में साहिए एक ऐसा नाम है जिसने कई दहाईयों तक फिल्मी दुनिया पर राज किया और जिनके नगमों से फिल्मी दुनिया आज भी गूंज रही है। दुनिया से अलविदा कहने के 33 सालों बाद भी उनके गीत लोगों की जुबान आज भी हैं चाहे वो बुजुर्ग हो या नौजवान उनके गीतों के तो सभी दीवाने हैं। साहिर का असली नाम अब्दुल हई था इनकी पैदाइश 8 मार्च 1921 में लुधियाना में हुई थी। पढाई के दौरान हुस्न और इश्क के कारण उन्हें कालेज से भी निकाल दिया गया। उनका दिल धड़काने वाली लड़की कोई आम लड़की नहीं बल्कि जानी मानी लेखिका अमृता प्रीतम थी। दिल के रास्ते में ठोकर खाने के बाद साहिर लाहौर रवाना हो गए जहां मुसीबतों ने उनका पीछा नहीं छोडा़। एक बार जब हालात ने सितम ढाना शुरु किया तो यह सिलसिला लम्बे अरसे तक चलता रहा। अपने हालात से घबरा कर साहिर ने हिंदुस्तान जाने का निर्णय लिया और उन्होंने अपना सफर शुरू कर जो मुम्बई पर आकर खत्म हुआ। यही से साहिर ने अपनी नई जिंदकी की शुरुआत की और शुरू हुआ कामयाबियों का दौर जो साहिर के रूकने के साथ भी नहीं रूका और अब तक अपनी कामयाबियों की रौशनी फैला रहा है। म्बे सितम ढाना शुरु किया ताक
साहिर को अपनी जिंदगी में बहुत नाम कमाना चाहते थे उनकी इसी महत्वाकांक्षा ने उन्हें फिल्मी दुनिया से जोड़ दिया। साहिर जानते थे यही वह स्टेज है जहां उन्हें दौलत शोहरत तो मिलेगी ही वह बहुत आसानी से लोगों तक अपनी बात भी पहुंचा पाएंगे। इतना कारगर कोई दूसरा तरीका नहीं हो सकता था। लोग यह भी कहते हैं कि साहिर ने यही सोच कर मुम्बई की ओर रुख किया था।1949 में साहिर की पहली फिल्म आजादी की राह पर आई जो बहुत कामयाब नहीं हो पाई लेकिन 1950 में आई नौजवान फिल्म के गीतों ने नौजवानों का चैन उडा लिया। ये गीत इतने मशहूर हुए कि आज भी लोगों को याद हैं। साहिर की कामयाबियों की दास्ता शुरू हो चुकी थी। साहिर ने जहां अपने गीतों पर लोगों को झूमने के लिए मजबूर किया वही फिल्मी दुनिया की मशहूर हस्तियों के साथ काम भी किया। साहिर और एसडी वर्मन की जोडी़ ने बाजी, जाल, टैक्सी ड्राइवर, मुनीम जी और प्यासा जैसी फिल्मों में अपने गीत संगीत के बेहतरीन तालमेल से धूम मचा दी। व़हीं रौशन के साथ मिलकर चित्रलेखा, बहूबेगम, दिल ही तो है, बरसात की रात, ताजमहल, बाबर और भीगी रात जैसी फिल्मों के जरिए अपने चाहनेवालों को दीवाना बना दिया। इसके अलावा उन्होंने ओपी नैय्यर, एन दत्ता, खैय्याम, जयदेव और कई दूसरे संगीतकारों के साथ काम किया और उनके साथ भी उन्होंने अपने चाहलने वालों को मायूस नहीं किया बल्कि उनकी कलम से मिलती है जिंदगी में मुहब्बबत कभी-कभी, नीले गगन के तले, छू लेने दो नाजुक होठों को, मैंने चांद और सितारों की तमन्ना की थी, मैं जब भी अकेली हुई हूं, दामन में दाग लगा बैठे, अभी ना जाओ छोड के दिल अभी भरा नहीं, मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया और रात भी है कुछ भीगी-भीगी जैसे लगमें लिखे जिसने उनके दीवानों को झूमने पर मजबूर कर दिया। आज भी उनके गानों के अल्फाज लोगों की जबान पर आज भी आम हैं। मन्ना त िए मजबूर किया वहींीं
साहिर पर उनके नाम का बहुत असर पड़ा वो वाकई लफ्ज़ों के जादूगर थे। वर्ना और क्या वजह थी कि अपने वक्त के महान लोगों के बीच में भी साहिर ने वह पहचान हासिल की जिसे आज तक भुलाया नहीं जा सका है। वह पाकिस्तान से आकर फिल्मी दुनिया में इस क़दर छाए कि उनके आगे पहले से अपनी जगह बना चुके लोगों की चमक भी फीकी पड़ गयी। फिल्मी सनअत की मौजूद भीड़ में उनके जरिए लिखे गये नगमों ने वो धूम मचायी कि लोग दूसरों को भूल गये और साहिर के सेहर का शिकार हो कर उनके दीवाने बन बैठे। साहिर ने अपने तीस साला फिल्मी सफ़र में हजारों गीत और नगमें लिखे जिसने उन्हें मकबूलियत की बलंदियों पर पहुंचा दिया। अपने वक्त में साहिर ने जवां दिलों की धड़कनों की नसों और उनकी रगों में दौड़ रहे दर्द को बार-बार लिखा और उनकी यही खासियत नौजवानों में उन्हें एक अहम मकाम दिलाने में कामयाब रही। साहिर के कई गानों ने बहुत शोहरत हासिल की जो आज भी खास ओ आम की जबान से सुने जा सकते हैं। जिन्हें नाज़ हैं हिंद पर ( प्यासा), जाने वो कैसे लोग थे ( प्यासा), ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो (प्यासा), वह सुबह तो कभी आएगी (फिर सुबह होगी), ये देश है वीर जवानों का ( नया दौर), हुस्न हाजिर है ( लैला मजनू), तुझको पुकारे मेरा प्यार ( नील कमल), जो वादा किया है व निभाना पड़ेगा( ताजमहल) वगैरह वगैरह उनके निहायत ही मकबूल गीतों में शुमार किये जाते हैं। साहिर ने हालात और हादसात को अपनी शायरी में और अपनी गीतों में पूरी तरह पिरो दिया था। चुनाचे उन्होंने कभी तो हिंदुस्तान के लोगों को बेदार करने की कोशिश की तो कभी समाज के बुरे ऱस्मों रिवाज पर चोट की। उनकी यही खासियत थी कि जिसकी वजह से वह अपने चाहने वालों में इस कदर मक़बूल हुए लेकिन नशे के जद में ऐसे आए कि वो अपने चाहने वालों के दरम्यान ज़्यादा दिन तक नहीं रह सके। अदब और संगीत का ये अजीम संगम १९७६ में अपने चाहने वालों से जुदा हो गया।
फिल्मी दुनिया के बेहतरीन गीतकारों का जिक्र हो और साहिर लुधियानवी की बात न हो ऐसा मुमकिन ही नहीं। गीतकारों में साहिए एक ऐसा नाम है जिसने कई दहाईयों तक फिल्मी दुनिया पर राज किया और जिनके नगमों से फिल्मी दुनिया आज भी गूंज रही है। दुनिया से अलविदा कहने के 33 सालों बाद भी उनके गीत लोगों की जुबान आज भी हैं चाहे वो बुजुर्ग हो या नौजवान उनके गीतों के तो सभी दीवाने हैं। साहिर का असली नाम अब्दुल हई था इनकी पैदाइश 8 मार्च 1921 में लुधियाना में हुई थी। पढाई के दौरान हुस्न और इश्क के कारण उन्हें कालेज से भी निकाल दिया गया। उनका दिल धड़काने वाली लड़की कोई आम लड़की नहीं बल्कि जानी मानी लेखिका अमृता प्रीतम थी। दिल के रास्ते में ठोकर खाने के बाद साहिर लाहौर रवाना हो गए जहां मुसीबतों ने उनका पीछा नहीं छोडा़। एक बार जब हालात ने सितम ढाना शुरु किया तो यह सिलसिला लम्बे अरसे तक चलता रहा। अपने हालात से घबरा कर साहिर ने हिंदुस्तान जाने का निर्णय लिया और उन्होंने अपना सफर शुरू कर जो मुम्बई पर आकर खत्म हुआ। यही से साहिर ने अपनी नई जिंदकी की शुरुआत की और शुरू हुआ कामयाबियों का दौर जो साहिर के रूकने के साथ भी नहीं रूका और अब तक अपनी कामयाबियों की रौशनी फैला रहा है। म्बे सितम ढाना शुरु किया ताक
साहिर को अपनी जिंदगी में बहुत नाम कमाना चाहते थे उनकी इसी महत्वाकांक्षा ने उन्हें फिल्मी दुनिया से जोड़ दिया। साहिर जानते थे यही वह स्टेज है जहां उन्हें दौलत शोहरत तो मिलेगी ही वह बहुत आसानी से लोगों तक अपनी बात भी पहुंचा पाएंगे। इतना कारगर कोई दूसरा तरीका नहीं हो सकता था। लोग यह भी कहते हैं कि साहिर ने यही सोच कर मुम्बई की ओर रुख किया था।1949 में साहिर की पहली फिल्म आजादी की राह पर आई जो बहुत कामयाब नहीं हो पाई लेकिन 1950 में आई नौजवान फिल्म के गीतों ने नौजवानों का चैन उडा लिया। ये गीत इतने मशहूर हुए कि आज भी लोगों को याद हैं। साहिर की कामयाबियों की दास्ता शुरू हो चुकी थी। साहिर ने जहां अपने गीतों पर लोगों को झूमने के लिए मजबूर किया वही फिल्मी दुनिया की मशहूर हस्तियों के साथ काम भी किया। साहिर और एसडी वर्मन की जोडी़ ने बाजी, जाल, टैक्सी ड्राइवर, मुनीम जी और प्यासा जैसी फिल्मों में अपने गीत संगीत के बेहतरीन तालमेल से धूम मचा दी। व़हीं रौशन के साथ मिलकर चित्रलेखा, बहूबेगम, दिल ही तो है, बरसात की रात, ताजमहल, बाबर और भीगी रात जैसी फिल्मों के जरिए अपने चाहनेवालों को दीवाना बना दिया। इसके अलावा उन्होंने ओपी नैय्यर, एन दत्ता, खैय्याम, जयदेव और कई दूसरे संगीतकारों के साथ काम किया और उनके साथ भी उन्होंने अपने चाहलने वालों को मायूस नहीं किया बल्कि उनकी कलम से मिलती है जिंदगी में मुहब्बबत कभी-कभी, नीले गगन के तले, छू लेने दो नाजुक होठों को, मैंने चांद और सितारों की तमन्ना की थी, मैं जब भी अकेली हुई हूं, दामन में दाग लगा बैठे, अभी ना जाओ छोड के दिल अभी भरा नहीं, मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया और रात भी है कुछ भीगी-भीगी जैसे लगमें लिखे जिसने उनके दीवानों को झूमने पर मजबूर कर दिया। आज भी उनके गानों के अल्फाज लोगों की जबान पर आज भी आम हैं। मन्ना त िए मजबूर किया वहींीं
साहिर पर उनके नाम का बहुत असर पड़ा वो वाकई लफ्ज़ों के जादूगर थे। वर्ना और क्या वजह थी कि अपने वक्त के महान लोगों के बीच में भी साहिर ने वह पहचान हासिल की जिसे आज तक भुलाया नहीं जा सका है। वह पाकिस्तान से आकर फिल्मी दुनिया में इस क़दर छाए कि उनके आगे पहले से अपनी जगह बना चुके लोगों की चमक भी फीकी पड़ गयी। फिल्मी सनअत की मौजूद भीड़ में उनके जरिए लिखे गये नगमों ने वो धूम मचायी कि लोग दूसरों को भूल गये और साहिर के सेहर का शिकार हो कर उनके दीवाने बन बैठे। साहिर ने अपने तीस साला फिल्मी सफ़र में हजारों गीत और नगमें लिखे जिसने उन्हें मकबूलियत की बलंदियों पर पहुंचा दिया। अपने वक्त में साहिर ने जवां दिलों की धड़कनों की नसों और उनकी रगों में दौड़ रहे दर्द को बार-बार लिखा और उनकी यही खासियत नौजवानों में उन्हें एक अहम मकाम दिलाने में कामयाब रही। साहिर के कई गानों ने बहुत शोहरत हासिल की जो आज भी खास ओ आम की जबान से सुने जा सकते हैं। जिन्हें नाज़ हैं हिंद पर ( प्यासा), जाने वो कैसे लोग थे ( प्यासा), ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो (प्यासा), वह सुबह तो कभी आएगी (फिर सुबह होगी), ये देश है वीर जवानों का ( नया दौर), हुस्न हाजिर है ( लैला मजनू), तुझको पुकारे मेरा प्यार ( नील कमल), जो वादा किया है व निभाना पड़ेगा( ताजमहल) वगैरह वगैरह उनके निहायत ही मकबूल गीतों में शुमार किये जाते हैं। साहिर ने हालात और हादसात को अपनी शायरी में और अपनी गीतों में पूरी तरह पिरो दिया था। चुनाचे उन्होंने कभी तो हिंदुस्तान के लोगों को बेदार करने की कोशिश की तो कभी समाज के बुरे ऱस्मों रिवाज पर चोट की। उनकी यही खासियत थी कि जिसकी वजह से वह अपने चाहने वालों में इस कदर मक़बूल हुए लेकिन नशे के जद में ऐसे आए कि वो अपने चाहने वालों के दरम्यान ज़्यादा दिन तक नहीं रह सके। अदब और संगीत का ये अजीम संगम १९७६ में अपने चाहने वालों से जुदा हो गया।